शुक्रवार, 29 मई 2020


अहसास ज़िंदगी 
ये ज़िंदगी की कश्मकश भी
अजीब है 
मरने से पहले 
जीना भी ज़रूरी है।  
डोरों में उलझती 
ज़िंदगी 
और हर डोर 
एक नई 
गाँठ का 
जोड़ लगा जाती है। 
तसव्वुर में 
बंधी जो तस्वीर
एक न एक दिन  
टूट बिखर जाती है।   
कि टुकड़े भी समेटे 
न गए हमसे 
बस अहसासों 
में ही बस गए हो तुम।       29 /05 /2020       सुजाता सक्सेना 

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

एक किश्ती 

ऊब डूब हो चलती जाती                                               कागज का है खेल सारा 
कागज की ये किश्ती                                                     पल में खेला  पल में बिखरा 
एक राह पर एक दिशा में                                                 अरमानों का मेला।
चलती रहती किश्ती।                                                          
नहीं हिचकती नहीं ठिठकती
बिन पतवार ये किश्ती
डाल पानी में कंकड़ उसने                                       
फिर खूब हिलाई किश्ती
इधर मटकती उधर भटकती
चलती जाती किश्ती
तभी अचानक छोटा कंकड़
कूद पड़ा किश्ती में
डगमग डगमग हुई जरा  सी
उलट पड़ी पानी में
दमभर चला ये खेल सारा
 बंद हुई ठिठोली                                                          सुजाता सक्सेना
मांझी रोता बैठ किनारे
किसने उलटी किश्ती

सोमवार, 21 जनवरी 2013

वो चला था -
तनहा सफ्फ़र में
 कभी कि- बेगानी
दुनिया में
मिले थे
हमनवा कई .
कारवां जुड़ता रहा
मसला चलता रहा
हर ठोकर पर
आस बांधे आए
कदम  भी कई
इस टूटे दिल को
मिलने में
वक़्त  के कई
दोराहे गुजरे
जुड़े तो थे
कई पैबंद
मगर फांकों में
सभी तार तार 
बिखरे .





main hun udta hua ek tukda
ehsas ka , jajbaton ka ,
aur bikharte un sapnon ka
jo dekhe the maine tumne
ek bite hue lamhe main.