एक किश्ती
ऊब डूब हो चलती जाती कागज का है खेल सारा
कागज की ये किश्ती पल में खेला पल में बिखरा एक राह पर एक दिशा में अरमानों का मेला।
चलती रहती किश्ती।
नहीं हिचकती नहीं ठिठकती
बिन पतवार ये किश्ती
डाल पानी में कंकड़ उसने
फिर खूब हिलाई किश्तीइधर मटकती उधर भटकती
चलती जाती किश्ती
तभी अचानक छोटा कंकड़
कूद पड़ा किश्ती में
डगमग डगमग हुई जरा सी
उलट पड़ी पानी में
दमभर चला ये खेल सारा
बंद हुई ठिठोली सुजाता सक्सेना
मांझी रोता बैठ किनारे
किसने उलटी किश्ती
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें